अमेरिका के साथ ट्रेड एग्रीमेंट के विरोध में किसान संगठनों की लामबंदी की तैयारी
गत 31 मार्च को नई दिल्ली में किसान संगठनों की बैठक हुई। एक विपक्षी सांसद के निवास पर हुई इस बैठक में अमेरिका के साथ भारत के व्यापार समझौते में देश के किसानों और कृषि व सहयोगी क्षेत्र के हितों की अनदेखी को लेकर एक देशव्यापी आंदोलन शुरू करने पर सहमति बनी है। इस बैठक में संयुक्त किसान मोर्चा के नेता बलबीर सिंह राजेवाल, राजू शेट्टी, वीएम सिंह, योगेंद्र यादव, सुनीलम, वामपंथी किसान संगठनों के प्रतिनिधि और सीपीआई (माले) के दो सांसदों समेत करीद डेढ़ दर्जन नेता शामिल थे।

वर्ष 2020 में तीन विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले किसान संगठन एक बार फिर एकजुट होने की तैयारी कर रहे हैं। इस बार वजह है प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते के जरिए भारत के कृषि बाजार को अमेरिका के लिए खोलने का दबाव। इन किसान संगठनों को आशंका है कि केंद्र सरकार अमेरिका को खुश करने के लिए देश के किसानों के हितों से समझौता कर सकती है। इसलिए इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। संयुक्त किसान मोर्चा की तर्ज पर बनाये जाने वाले इस मोर्चे का स्वरूप जल्दी ही सामने आ सकता है।
इस पहल में शामिल महाराष्ट्र के पूर्व सांसद और स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के नेता राजू शेट्टी ने रूरल वॉयस को बताया कि गत 31 मार्च को नई दिल्ली में किसान संगठनों की बैठक हुई। एक विपक्षी सांसद के निवास पर हुई इस बैठक में अमेरिका के साथ भारत के व्यापार समझौते में देश के किसानों और कृषि व सहयोगी क्षेत्र के हितों की अनदेखी को लेकर एक देशव्यापी आंदोलन शुरू करने पर सहमति बनी है। इस बैठक में संयुक्त किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल, राजू शेट्टी, सरदार वीएम सिंह, योगेंद्र यादव, सुनीलम, वामपंथी किसान संगठनों के प्रतिनिधि और सीपीआई (माले) के दो सांसदों समेत करीद डेढ़ दर्जन नेता शामिल थे।
राजू शेट्टी का कहना है कि जिस तरह से 2017 में ऑल इंडिया किसान संघर्ष कॉर्डिनेशन कमेटी (AIKSCC) बनाकर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सहित किसानों के मुद्दों पर देश भर में यात्राएं निकाली गई थीं, उसी तरह अब अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार समझौते से किसानों के हितों को नुकसान के मुद्दे पर किसानों को जागरूक किया जाएगा।
गौरतलब है कि 2020 के किसान आंदोलन के दौरान विभिन्न किसान संगठन संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले एकजुट हुए थे। इसी एकजुटता का नतीजा था कि साल भर चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन के बाद केंद्र सरकार को तीनों विवादित कृषि कानून वापस लेने पड़े थे। लेकिन आंदोलन के बाद चुनाव लड़ने के मुद्दे पर किसान संगठनों में खींचतान बढ़ी और संयुक्त किसान मोर्चा विभिन्न खेमों में बंट गया। इससे किसानों की अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की ताकत कमजोर हुई।
एमएसपी की कानूनी गारंटी सहित कई मांगों को लेकर हरियाणा-पंजाब के शंभू और खनौरी बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसान मोर्चों को जिस तरह कड़ी कार्रवाई कर हटाया गया, तब भी किसानों की एकजुटता बढ़ाने की जरूरत महसूस की गई। असल में किसान संगठनों को समझ आ गया है कि अलग-अलग बंटकर आंदोलन करने से सरकार पर दबाव नहीं बनाया जा सकता है। 31 मार्च की बैठक में पंजाब और हरियाणा बॉर्डर पर 13 महीने चले आंदोलन पर भी चर्चा हुई।
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में किसानों के हितों की अनदेखी के खिलाफ आंदोलन की रूपरेखा के लिए जल्दी ही अगली बैठक होगी। उस बैठक में आंदोलन का स्वरूप और भावी रणनीति तय की जाएगी। इसके अलावा इसमें कौन से मुद्दे शामिल होंगे, यह भी तय होगा। शुरुआती चर्चा के आधार पर अमेरिका के साथ व्यापार समझौते और एमएसपी की गारंटी के मुद्दों को शामिल करने पर सहमति बनी है।