यूएसटीआर की रिपोर्ट के जरिए अमेरिका की भारत पर कृषि बाजार खोलने के दबाव की कोशिश
यूएसटीआर की रिपोर्ट में भारत पर 16 पेज में कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में भारत द्वारा अमेरिकी निर्यात में अड़चने लगाने की बात कही गई है। लेकिन कृषि और सहयोगी क्षेत्र जिनमें डेयरी, पॉल्ट्री और फिशरीज के बारे में प्रमुखता से बात करते हुए भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद की व्यवस्था और सरकार द्वारा जा रही सब्सिडी को मुक्त व्यापार के रास्ते में बाधक बताया गया है। इस रिपोर्ट के जरिये संकेत मिल रहा कि भारत के साथ ट्रेड समझौते के मामले में अमेरिका का रुख कृषि और सहयोगी क्षेत्र के लिए काफी सख्त रहने वाला है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की रेसिप्रोकल टैरिफ पर 2 अप्रैल की घोषणा के ठीक पहले अमेरिकी ट्रेड रिप्रेसेंटेटेव (यूएसटीआर) द्वारा फॉरेन ट्रेड बैरियर्स पर रिपोर्ट जारी कर विदेश व्यापार से जुड़े अहम मुद्दों को उठाया गया है। इसके जरिए अमेरिका भारत समेत दुनिया भर के देशों पर अमेरिकी उत्पादों को बाजार देने का दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।
इस रिपोर्ट में भारत पर 16 पेज में कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में भारत द्वारा अमेरिकी निर्यात में अड़चने लगाने की बात कही गई है। लेकिन कृषि और सहयोगी क्षेत्र जिनमें डेयरी, पॉल्ट्री और फिशरीज के बारे में प्रमुखता से बात करते हुए भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद की व्यवस्था और सरकार द्वारा जा रही सब्सिडी को मुक्त व्यापार के रास्ते में बाधक बताया गया है। इस रिपोर्ट के जरिये संकेत मिल रहा कि भारत के साथ ट्रेड समझौते के मामले में अमेरिका का रुख कृषि और सहयोगी क्षेत्र के लिए काफी सख्त रहने वाला है।
यूएस इंडिया ट्रेड पॉलिसी फोरम में वार्ताओं के 2005 से जारी रहने की चर्चा करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का मोस्ट फेवर्ड नेशन के मामले में औसत सीम शुल्क 17 फीसदी है। इसका गैर कृषि उत्पादों के लिए औसत 13.5 फीसदी है और कृषि उत्पादों के लिए 39 फीसदी है। भारत ने खाद्य तेलों, मक्का, सेब, कॉफी, नेचुरल रबर, रेजिन बादाम, अल्कोहलिक बेवरेजेज जैसे उत्पादों पर 45 फीसदी से लेकर 150 फीसदी तक का सीमा शुल्क लगा रखा है। इनके अलावा दूसरे कृषि व सहयोगी क्षेत्र के प्रसंस्कृत उत्पादों जैसे आलू, सिट्रस, अंगूर, पॉल्ट्री, फ्रोजन फ्रेंच फ्राइज, चाकलेज, कुकीज और डिब्बाबंद पीचेज जैसे तमाम उत्पादों पर ऊंची सीमा शुल्क दरें लागू हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (डब्लूटीओ) के बाउंड रेट के मामले में भारत की दरें सबसे अधिक हैं और इनका औसत 113.1 फीसदी दी, इनका उच्चतम स्तर 300 फीसदी तक जाता है। भारत जिस तरह से सीमा शुल्क दरों में बदलाव करता है उसके अमेरिका के कामगारों, किसानों और रैंचर्स के लिए मुश्किलें खड़ी होती हैं। साल 2019 में जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रिफेरेंसेज (जीएसपी) के तहत अमेरिका द्वारा भारत के लिए प्रिफेरेंसियल टैरिफ बेनेफिट्स समाप्त करने के बाद भारत ने इसके विरोध में बादाम, सेब, अखरोट, चना और मसूर जैसे 28 उत्पादों पर 1.7 फीसदी से लेकर 20 फीसदी तक की सीमा शुल्क बढ़ोतरी कर दी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मानकों के आधार पर और जटिल मंजूरी प्रक्रिया के जरिये गैर टैरिफ बैरियर भी लगाता है। इसमें एथेनॉल के आयात नियमों के जरिए रोकने की बात कही गई है। वहीं जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) उत्पादों के आयात के मामले में फैसले लेने में देरी और नियमों में पारदर्शिता की कमी की बात कही गई है। जाहिर सी बाद है कि अमेरिका अपनी जीएम कृषि फसलों जिसमें, मक्का, सोयाबीन और कपास के साथ ही पशुचारे में उपयोग की जाने वाली फसलों के आयात का रास्ता खोलने के लिए दबाव बनाने की कोशिश करेगा।
इसके साथ ही भारत में 25 फसलों पर एमएसपी देने की बात रिपोर्ट में कही गई है और खाद्य सुरक्षा के नाम पर एमएसपी खरीद के जरिये पब्लिक स्टॉक बनाने की बात करते हुए इसे मार्केट डिस्टॉर्टेड प्रेक्टिस बताया गया है। रिपोर्ट में भारत द्वारा किसानों को इनपुट सब्सिडी देने की बात कही गई है। यही नहीं इस रिपोर्ट में तमाम मुद्दों पर भारत के खिलाफ डब्लूटीओ के डिस्प्यूट सेटलमेंट पैनल (डीएसपी) में भी जाने का जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि भारत खाद्य सुरक्षा के नाम पर गेहूं और चावल की सरकारी खऱीद करता है जबकि वैश्विक निर्यात बाजार में चावल के मामले में भारत की हिस्सेदारी 40 फीसदी तक भी पहुची है। इसमें कहा गया है कि एमएसपी और सब्सिडी के मामले में भारत डब्लूटीओ के 2013 के एक अस्थायी राहत वाले फैसले का सहारा ले रहा है और खुद स्वीकार कर चुका है कि पिछले चार साल में चावल पर उसकी सब्सिडी का स्तर डब्लूटीओ में तय स्तर से अधिक रहा है। इस रिपोर्टे में एमएसपी और सब्सिडी पर काफी विस्तार से जानकारी दी गई है।
रिपोर्ट में जीएम फसलों के मामले में जहां जेनेटिकली इंजीनियर्ड अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) के फैसलों में देरी की बात कही गई है। वहीं फूड सेफ्टी स्टेंडर्ड अथारिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) द्वारा मानकों के निर्धारण और मंजूरी प्रक्रिया में देरी जैसे सवाल उठाते हुए डेयरी और पॉल्ट्री उत्पादों को मार्केट एक्सेस देने में देरी की बात कही गई है। वहीं डेयरी और पॉल्ट्री के मामले में एफएसएसएआई द्वारा तय मानकों और सर्टिफिकेट की शर्तों को व्यापार विरोधी करार दिया गया है।
लगता है कि इस रिपोर्ट में भारत के व्यापार नियमों और नीतिगत प्रावधानों पर तमाम सवाल उठाने के अमेरिका का मकसद वार्ता में भारतीय पक्ष पर दबाव बनाना है। इसके साथ ही इस रिपोर्ट में भारत पर जिन 16 पेज में बात की गई है उसका सबसे बड़ा हिस्सा कृषि और सहयोगी क्षेत्र पर केंद्रित रहा है। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका भारतीय कृषि और सहयोगी क्षेत्र के बाजार प्रवेश को अपने अनुकूल बनाना चाहता है। अब यह हमारे वार्ताकारों पर निर्भर है कि वह भारतीय किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी उम्मीद को परवान चढ़ने से रोकते हैं।